श्री चिंतामण मंदिर

श्री चिंतामण मंदिर

यहाँ श्री चिंतामण्सा गणेश के साथ इच्छापूर्ण और चिंताहरण गणेश की प्रतिमाएँ हैं । चैत्र मास बुधवार के दिन यहाँ मेला लगता है । बड़े भक्ति भाव से किसी शुभ कार्य अथवा विवाह का निमंत्रण पहले यहाँ अर्पण कर कार्य सम्पन्न होने का आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है ।

वैधशाला

वैधशाला

राजा जयसिंह ने जयपुर, काषी, मथुरा, दिल्ली के साथ उज्जैन में भी वैधशाला का निर्माण कराया । इसका निर्माण सन् 1730 में हुआ । ज्योतिर्गणना की दृष्टि से उज्जैन का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है । खगोलीय अध्ययन के लिये इस केन्द्र की भौगोलिक स्थिति अत्यंत उपयोगी है ।

शनि मंदिर

शनि मंदिर

नगर से दक्षिण दिशा में 6.5 कि.मी. की दूरी पर इंदौर रोड़ पर त्रिवेणी संगम तीर्थ है । इसी संगम पर घने वृक्षों के बीच नवग्रहों का बहुत प्राचीन मंदिर तथा शनि मंदिर है । प्रत्येक शनिष्चरी अमावस्या पर यहाँ हजारों श्रद्धालु आते हैं तब यहाँ मेले जैसा दृष्य रहता है ।

इस्कॉन मंदिर

इस्कॉन मंदिर

महाकाल मंदिर से 7.5 कि.मी. दूर में स्थित यह मंदिर अन्तर्राष्ट्रिय कृष्ण भावनामृत संघ (इस्कॉन) द्वारा निर्मित है । राधामदनमोहन का यह मंदिर आधुनिक वास्तुषिल्प का अनुपम उदाहरण है । श्रीमद भक्तिचारू स्वामजी महाराज की संकल्पना का यह साकार रूप् है ।

सांदीपनी आश्रम

सांदीपनी आश्रम

महर्षि सांदीपनि व्यास के इस आश्रम में भगवान श्री कृष्ण, श्री बलराम एवं सुदामा ने गुरूकुल परंपरानुसार अध्ययन कर चौदह विद्याएँ और चौसठ कलाएँ सीखी थी ।

श्री मंगलनाथ मंदिर

श्री मंगलनाथ मंदिर

उज्जयिनी का एक महत्वपूर्ण तथा महिमावान स्थान है मंगलनाथ क्षिप्रा नदी के तट पर सांदिपनी आश्रम के पास एक उँचे पीठ पर मंगलनाथ का मंदिर है । यहाँ पर मंगलदोष निवारण हेतु भात पूजा करवाई जाती है ।

श्री कालभैरव मंदिर

श्री कालभैरव मंदिर

अष्ट भैरवों में प्रमुख श्री कालभैरव का यह मंदिर बहुत प्राचीन और चमत्कारिक है । इसकी प्रसिद्धि का प्रमुख कारण है कि मुँह में किसी प्रकार का छेद नहीं है, फिर भी भैरव की यह प्रतिमा मदिरापान करती है ।

श्री गढ़कालिका मंदिर

श्री गढ़कालिका मंदिर

गढ़कालिका देवी महाकवि कालीदास की आराध्य देवी रही है इनकी कृपा से ही कालीदास को विद्वता प्राप्त हुई । यह तांत्रिक सिद्ध स्थान एवं शक्तिपीठ है । महात्म्य के अनुसार देष के बारह शक्तिपीठों में छठा स्थान यहीं है ।

भृतहरि गुफा

भृतहरि गुफा

सम्राट विक्रमादित्य के बड़े भाई महाराजा भर्तृहरि ने नाथपंथ की दीक्षा ली और इसी स्थान पर साधना की । क्षिप्रा तट पर स्थित यह प्राचीन गुप्त बौद्धकालीन व परमारकालीन स्थापत्य रचना है । गुफा का प्रवेष मार्ग संकरा है अंदर गोपीचंदजी की प्रतिमा है ।