उज्जैन-दर्शन

 


 
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उज्जैयिनी (उज्जैन)

उज्जैन - उज्जैन का प्राचीन नाम है उज्जैयिनी, भारत के मध्य में स्थित उसकी परम्परागत सांस्कृतिक राजधानी रही । यह चिरकाल तक भारत की राजनैतिक धुरी भी रही । इस नगरी का पोराणिक और धार्मिक महत्व सर्वज्ञात है । भगवान श्री कृष्ण की यह शिक्षा स्थली रही । ...
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श्री महाकालेश्वर

श्री महाकालेश्वर - ज्योर्तिर्लिंग श्री महाकाल पृथ्वी लोक के अधिपति अर्थात राजा है, देश के बारह ज्योर्तिलिंग में श्री महाकाल एकमात्र ऐसा ज्योर्तिलिंग है जिसकी प्रतिष्ठा पूरी पृथ्वी के राजा और मृत्यु लोक के देवता श्री महाकाल के रूप् में की गई है । (more…) ...
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सिंहस्थ

सिंहस्थ - पुराणों में उललेख है समुद्र मंथन सेप्राप्त 14 रत्न में अमृत भी प्राप्त हुआ था । अमृत को लेकर देव-दानवों में संघर्ष से प्रयाग, नाशिक , उज्जैन व हरिद्वार में अमृत बूंद झलकी थी, जिससे चारों तीर्थ अति पूण्यप्रद व अमृतमय हो गए । (more…) ...
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श्री बड़ा गणेश मंदिर

श्री बड़ा गणेश मंदिर श्री महाकालेश्वर मंदिर के समीप श्री गणेषजी की भव्य और मनोहारी विशाल प्रतिमा है । यह मंदिर के मध्य में पंचमुखी श्री हनुमानजी की प्रतिमा है जो पृथ्वी, कुर्मनाग और उस पर कमल कीविकसित नाभि पर प्रतिष्ठित है । ...
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श्री हरसिद्धि देवी मंदिर

उज्जैन में प्राचीन व पवित्र स्थानों में श्री हरसिद्धि देवी विशेष महत्वपूर्ण है, दक्ष यज्ञ विध्वंष के पश्चात सती की कोहनी यहा गिरी थी इसलिए तांत्रिक ग्रंथों में इसे शक्तिपीठ व सिद्धपीठ कहा गया है । यह 52 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ है । यह देवी सम्राट विक्रमादित्य की आराध्य कुलदेवी रही है । विक्रमादित्य ने यहाँ तपस्या कर उनके दर्शन किये थे । ...
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सम्राट विक्रमादित्य

उज्जैयिनी के साथ सम्राट विक्रमादित्य का नाम जुड़ा हुआ है । राजा विक्रम के सिंहासन की पुतलीयों की कहानियाँ सिंहासन बत्तीसी तथा बेताल पच्चीसी की कहानियाँ मालवा के जन-जन में व्यापक है । महाराजा विक्रमादित्य की एक आधुनिक प्रतिमा हरसिद्धी के पास उत्तर में स्थित है। ...
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रामघाट

क्षिप्रा नदी-स्कन्द में वर्णित वह सर्वश्रेष्ठ नदी है, जिसमें तट पट हर बारह वर्षों में विश्वप्रसिद्ध सिंहस्थ (महाकुंभ) का पावन आयोजन होता है । क्षिप्रा नदी का यह घाट (रामघाट) स्टेशन से 3 कि.मी. की दूरी पर स्थित है । क्षिप्रा महासभा द्वारा श्री रामघाट पर गोघुली बेला में नित्य आरती की जाती है । ...
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भृतहरि गुफा

सम्राट विक्रमादित्य के बड़े भाई महाराजा भर्तृहरि ने नाथपंथ की दीक्षा ली और इसी स्थान पर साधना की । क्षिप्रा तट पर स्थित यह प्राचीन गुप्त बौद्धकालीन व परमारकालीन स्थापत्य रचना है । गुफा का प्रवेष मार्ग संकरा है अंदर गोपीचंदजी की प्रतिमा है । ...
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श्री गढ़कालिका मंदिर

गढ़कालिका देवी महाकवि कालीदास की आराध्य देवी रही है इनकी कृपा से ही कालीदास को विद्वता प्राप्त हुई । यह तांत्रिक सिद्ध स्थान एवं शक्तिपीठ है । महात्म्य के अनुसार देष के बारह शक्तिपीठों में छठा स्थान यहीं है । ...
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श्री कालभैरव मंदिर

अष्ट भैरवों में प्रमुख श्री कालभैरव का यह मंदिर बहुत प्राचीन और चमत्कारिक है । इसकी प्रसिद्धि का प्रमुख कारण है कि मुँह में किसी प्रकार का छेद नहीं है, फिर भी भैरव की यह प्रतिमा मदिरापान करती है । ...
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श्री सिद्धनाथ मंदिर

श्री सिद्धनाथ मंदिर उज्जयिनी का एक महत्वपूर्ण तथा महिमावान स्थान है । यह स्थान पितृ देवता की पूजन हेतु महत्वपूर्ण है । ...
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श्री मंगलनाथ मंदिर

उज्जयिनी का एक महत्वपूर्ण तथा महिमावान स्थान है मंगलनाथ क्षिप्रा नदी के तट पर सांदिपनी आश्रम के पास एक उँचे पीठ पर मंगलनाथ का मंदिर है । यहाँ पर मंगलदोष निवारण हेतु भात पूजा करवाई जाती है । ...
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सांदीपनी आश्रम

महर्षि सांदीपनि व्यास के इस आश्रम में भगवान श्री कृष्ण, श्री बलराम एवं सुदामा ने गुरूकुल परंपरानुसार अध्ययन कर चौदह विद्याएँ और चौसठ कलाएँ सीखी थी । ...
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इस्कॉन मंदिर

महाकाल मंदिर से 7.5 कि.मी. दूर में स्थित यह मंदिर अन्तर्राष्ट्रिय कृष्ण भावनामृत संघ (इस्कॉन) द्वारा निर्मित है । राधामदनमोहन का यह मंदिर आधुनिक वास्तुषिल्प का अनुपम उदाहरण है । श्रीमद भक्तिचारू स्वामजी महाराज की संकल्पना का यह साकार रूप् है । ...
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शनि मंदिर

नगर से दक्षिण दिशा में 6.5 कि.मी. की दूरी पर इंदौर रोड़ पर त्रिवेणी संगम तीर्थ है । इसी संगम पर घने वृक्षों के बीच नवग्रहों का बहुत प्राचीन मंदिर तथा शनि मंदिर है । प्रत्येक शनिष्चरी अमावस्या पर यहाँ हजारों श्रद्धालु आते हैं तब यहाँ मेले जैसा दृष्य रहता है । ...
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वैधशाला

राजा जयसिंह ने जयपुर, काषी, मथुरा, दिल्ली के साथ उज्जैन में भी वैधशाला का निर्माण कराया । इसका निर्माण सन् 1730 में हुआ । ज्योतिर्गणना की दृष्टि से उज्जैन का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है । खगोलीय अध्ययन के लिये इस केन्द्र की भौगोलिक स्थिति अत्यंत उपयोगी है । ...
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श्री चिंतामण मंदिर

यहाँ श्री चिंतामण्सा गणेश के साथ इच्छापूर्ण और चिंताहरण गणेश की प्रतिमाएँ हैं । चैत्र मास बुधवार के दिन यहाँ मेला लगता है । बड़े भक्ति भाव से किसी शुभ कार्य अथवा विवाह का निमंत्रण पहले यहाँ अर्पण कर कार्य सम्पन्न होने का आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है । ...
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